एक सफर

वो गुज़रता हुआ समस्या से,
हल ढूँढता पूरी तपस्या से,
भावी अनिश्चितता में जी रहा,
चिंता चुनौतियों के कड़वे प्याले पी रहा ।।

सिलसिला ये रुकने का नाम ले अगर,
ठहर कर सोचने का काल हो मगर,
सुलझ पाएगा कब चुनौतियों का फंदा ??
जब समस्याओं को कतई ना बनाएँगे प्रमुख मुद्दा ।।

कपाल पर आते हुए बोझ का क्या वेग है !
छुपे कंटकों से लबालब भरी हुई यह सेज है,
घने अंधियारे में यदि वो भाग सकता तेज़ है,
निस्तार कर जाएगा सरहद, देखना यह शेष है ।।

देखना जो शेष है, उस पर विवश क्यूँ हो रहा,
देवव्रत सम बाण की शैया पे कब से सो रहा,
आत्मभू तू है नहीं फिर क्यूँ स्वयं से मर मिटे,
डगमगा जाएँगी अड़चन, उत्साह यदि नित बो रहा ।।

-प्रखर

मैं कैद हूँ !!

मैं कैद हूँ , मैं कैद हूँ
चार दिवारी में ही
बस दो रोटी से ही
ओढ़े हूँ चदरी को
घनी काली बदरी को, देख
प्रतिपल मुस्तैद हूँ ।।
मैं कैद हूँ ……

ये कैद तनिक है विचित्र
निज भवन इसका चरित्र
बहिर्गमन जब तक निषेध,
विषाणु को रहे खेद ।।
इस वैश्विक महामारी में
लक्ष्य मैं अभेद्य हूँ
मैं कैद हूँ …….

जो कैद ना हुआ अब भी
तो खोएगा तू खुद को ही
खाक छान मारी , किन्तु
इस विषाणु का तोड़ नहीं ।।
इस राक्षसी चक्रव्यूह में,
मैं नन्हा सा छेद हूँ
मैं कैद हूँ , मैं कैद हूँ ।।

प्रखर

शिवत्व

शिव जी के विष पान के चर्चे
कण्ठ से ऊपर, कण्ठ से नीचे।
भली भांति शिवत्व को पहचानें
विष पान मर्म आओ जानें ।।

कण्ठ से ऊपर उगला जाए
ताण्डव कर कर पगला जाए।
कण्ठ से नीचे निगला जाए
बर्फ सरीखा पिघला जाए ।।

यह जीवन भी कुछ विष सा है
इसे ना पीने की लिप्सा है।
यदि इसका कोई विकल्प न हो
फिर क्या तुम में तितिक्षा है ???

तितिक्षा ही शिव का कण्ठ है
जो ना समझा वो लंठ है
जन कल्याण हेतु जो आहूत होता
शिव भक्त वही निशंक है ।।

प्रखर ‘प्रज्ञ’

द्रव्यमान का विज्ञान

गति समय की निश्चित है
त्वरण शून्य को प्रवृत्त है
बल कैसे हो अशून्य
द्रव्यमान अब चिंतित है
टकरा रहा यहाँ वहाँ
आवेग नहीं पर किंचित है

घूर्णन करता वह हर घड़ी
परिस्थिति ज्यों की त्यों खड़ी
पीठ दिखाता स्थिरता को
ना ही वर्तन विपरीत है

बुद्धि लगाई द्रव्यमान ने
कहाँ रह गयी कमी ज्ञान में
वेग चाहिए, ना कि गति
अदिश- सदिश का खेल है विकसित

परिस्थिति से द्रव्यमान परस्पर
सापेक्षता क्यों ही ढूँढता
दिशाहीन थी चेष्टा प्रतिपल
आकर्षण भी नहीं था प्रबल
(Above stanza is all about theory of relativity)

(गति=Speed), (त्वरण=acceleration), (बल=Force), (द्रव्यमान=Mass), (टकरा=Collision), (आवेग=Impulse), (घूर्णन=Rotation), (परिस्थिति=Goal ,Success etc), (स्थिरता=Stagnation), (वर्तन=Revolution), (द्रव्यमान=Mass), स्थिरता (Stagnation), वर्तन (Revolution), (ज्ञान=Concepts), (वेग=Velocity), (गति =Speed), (अदिश=Scalar), (सदिश= Vector), (सापेक्षता=Relativity),
(चेष्टा प्रतिपल आकर्षण प्रबल = continous mutual force of attraction between two bodies, according to theory of relativity)

In this poetry समय is not time, it is the circumstances/ Situations anybody going through.

अनिश्चितता का दौर

अनिश्चितता का दौर है
अंधेरा घनघोर है
विवशताओं की होड़ है
पग पग पर मोड़ है ।।

चल रहा मैं रुक रुक कर
रखता कदम फूँक फूँक कर
तब भी धँस जाता हूँ
दल दल में फँस जाता हूँ

संभावनाएँ कह रहीं
“मैं आते आते रह गई”
“जो तुमको बचा पाती”
“अगर मगर में ढह गई” ।।

अब प्रयास और प्रबल होगा
सुदृढ़ मनोबल होगा
देखता हूँ मैं भी अब
किसमें रोकने का बल होगा ।।

अब मैं अनुभवहीन नहीं
बिल्कुल भी दीन नहीं
प्रचंडता इरादों में
शक्तियाँ भी क्षीण नहीं ।।

गांडीव को उठाकर अब
लक्ष्य भेदता चुन चुन
सारथी मेरी आत्मा
मन मेरा स्वयं अर्जुन ।।

  • प्रखर

अगर मगर की डगर

ज़िन्दगी ये एक सफर ।
अगर मगर की डगर ।।

ध्यान से चला कोई
अनजान बन चला कोई
अभिमान से कोई चला
तो कोई स्वाभिमान से ।।

कोई रुका आलस्य में
कोई थका प्रमाद में
कुछ अकेले ना चल सके
थमे किसी की याद में ।।

जो थम गए तो चौपट है
मंज़िल का बन्द चौखट है
मुड़ गए हो अब जब तुम
निराशा की नौबत है ।।

किंचित खुश हो कर के
आगे बढ़ ठोकर से
अग्रसर जो हो जाये
कल्पवृक्ष बो जाए ।।

-प्रखर

ज़िन्दगी ये बर्फ सी

ज़िन्दगी ये बर्फ सी
अनिश्चितता पर तर्क सी ।।
पिघल रही घड़ी घड़ी
कल की फिक्र क्यों पड़ी ।।

बर्फ यह तो ठोस है
जैसे हमारा रोष है ।।
कहता तापमान इसे
पिघलने में ही मोक्ष है ।।

जो पिघल रहा वो कह रहा
“मैं पानी, मस्त बह रहा ” ।।
क्योंकि, बहना ही सत्य है
ठहरना जड़त्व है ।।

समझें इस आशय को
भीतर के महाशय को ।।
क्यों करें चिंता, मानो
ठहरा जलाशय हो ।।

कर जाएँ, कह जाएँ
चाहतें इस जीवन की
अधूरी ना रह जाये ।।

– प्रखर

समय समय की बात

समय समय की बात है।
समय समय का जोर ।।
कभी मस्त पवन का झोका है ।
कभी कारी बदरी चहुंओर ।।

पलट रही हवा क्षण क्षण में ।
जैसे दिशाहीन व्यक्ति जीवन में ।।
नभ की ओर नज़र तू अटका ।
चलता जा अविचल , उसी ओर ।1।

राह पर मिलेंगे अच्छे बुरे प्रारब्ध ।
उन्हें देख ना होना स्तब्ध ।।
कदमों के जोर बढ़ा चढ़ा कर ।
कर देना गर्जना घनघोर ।2।

यदि पथ पर खोज पाओ धृति (धैर्य) ।
करना उससे घनिष्ठ मैत्री ।।
विवेक क्षीणता की स्थिति में ।
सहचर देगी साथ पुरजोर ।3।

यदि मिले पथ पर तुम्हे कीर्ति ।
ना बन जाना पूजा की मूर्ति ।।
निमित्त मात्र का किरदार भाँपना ।
वरना बन जाओगे शंख ढपोर ।4।

मस्तिष्क पटल पर बनती चलेंगी स्मृतियाँ ।
चह चहाएंगी मानो विचरण करती चिड़िया ।।
इन्हें हृदय के तल में सहेजना सीखो ।
अनंत तक रहोगे परम आनंद से सराबोर ।5।

समय … समय….. …… ……

-प्रखर

रावण का साक्षात्कार

विजया दशमी के अवसर पर ।
रावण का दमन अत्यावश्यक ।।
था वह प्रकांड शास्त्र ज्ञाता ।
परस्पर था नीति पथ नाशक ।।

शपथ लें आज नीति पथ की ।
न करें नकल अब गिरगिट की ।।

भीतर का रावण पहचाने ।
ऐसे ही धनुष को ना तानें ।।
आत्म निरीक्षण किये बिना ।
श्रीराम स्वयं को ना मानें ।।

– प्रखर

मोक्ष

When all curiosities and confusions in and about life comes to rest by the torch of consciousness, then slowly we feel unconstrained (not disconnected) from our outer self, that state of bliss is moksha.

Consciousness is, our satisfaction about justification of the reasons of happenings inside as well as around us, which gradually end our process of wondering about anything.

” यूं ही “

कुछ लिख जाऊं , ये सोच कर कलम उठाई है ।
बेचैनी है, व्यथा है , या फिर हूँ मैं कुछ गुम सा ।
सभा , आप (self) के साथ ही आज मैंने बिठाई है ।।
काफी भरा हुआ सा प्रतीत होता हूँ अंतर्मन से ।
जैसे सारी रात कम पड़ने वाली हो , बयां करने में ।
और ये मन भी कमबख्त कुछ साफ साफ कहता नहीं ।
क्या सोचूं ?? …. … … इस सोच में डूबा हूँ ।
या फिर,
इस उड़ते हुए ख्याल से बचने की फिराक में उलझा हुआ ।
.

.

खैर ,… अब जो भी हो …….. कोशिश जारी है सुलझाने की।।
आशा है ,किसी निष्कर्ष तक पहुँच पाने की ।।

“प्रखर”

“अमूल्य मित्र “

मित्र क्या है ??? , परछाई है ,
हाथ थाम ले , जब आगे खाई है ।।

आईना है दुर्गुणों को दिखलाने में ,
माहिर है उलझनों को सुलझाने में ।।

स्पष्टवादिता का जीता जागता उदाहरण है ,
अमूल्य है आपके लिए,
भले दुनिया के लिए साधारण है ।।

जश्न में चार चांद लगा देता है ,
दुख की घड़ी में ढांढस बंधा देता है ।।

ईश्वर की रचना है यह विचित्र ,
खुशनसीब हैं आप ,
यदि आप के पास हैं सच्चे मित्र ।।

— “प्रखर”

वह “पिता” है

बचपन से युवावस्था तक, प्यार से मार तक,
जिनका कीमती समय मुझे इंसान बनाने में बीता है..
वो शख्स कोई और नही,… पिता है ।।

मेरी रग रग से वो वाकिफ़ है ,
मेरा पूरब पश्चिम भी उसे भले पता है ,
एक क्षण में माफ कर देता लाखों खता है ….
वो शख्स कोई और नही,… पिता है ।।

Late Post ::

“Happy Father’s day “

जज़्बे का जोर

क्या है जिंदगी, बस उलझनों की डोर है ।
एक सिरा हाथ में , दूसरा कहीं और है ।।
इन सब के बीच में, अनिश्चितता और है ।
उलझनों से बच निकलने की , आशा चहुंओर है ।।

प्रश्न जो उठते हैं मन में,
ढूंढता तू क्यों गगन में ।
झांक तू अपने ही अंदर,
पाएगा अविचल समंदर ।।
चीर कर निकला समंदर , तू वो गोताखोर है ।
अड़चनों को डगमगा दे, तुझ ही में वो हिलोर है ।।

आएगी पथ पर जो आंधी,
कल्पना जिसकी थी ना की ।
हौसलों की डोर से जो,
जज़्बे की एक गांठ बांधी ।।
ना हवा ने देखा ऐसा , योद्धा कोई और है ।
तेरे आगे टूटकर , हारा हवा का जोर है ।।

क्या है जिंदगी ….. बस उलझनों की डोर है ।।

“प्रखर”

अहम करें खत्म

# 2
My composition on “Ego dissolution”

“मैं” के तम को करें खतम । ( मैं = Ego )
“वयम्” भाव का करें जतन ।
दशा अगर हो दुख पीड़ा की ।
कतई ना होगे तुम निर्जन ।।

कोई दूजा हो या हो करीब ,
धनधान्य हो या फिर गरीब ।
समभाव से सबसे रहने की ,
प्रभावशाली यह तरकीब ।
एकात्मवाद के पथ पर चल कर ,
तोड़ दें मन के सारे भ्रम …..
“मैं” के तम को करें खतम, “वयम्” भाव का करें जतन ।।

अहम वह विष का प्याला है ,
पीकर बस बैर ही पाला है ।
इसकी पुनरावृत्ति कर के ,
जलती आत्मग्लानि की ज्वाला है ।
श्रेष्ठता सिद्धि की दौड़ में ,
कहता वह, “मैं ही सर्वप्रथम ” …
“मैं” के तम को करें खतम , “वयम्” भाव का करें जतन ।।

©प्रखर

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